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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

भुशुण्ड उवाच । विद्धि त्वं चेतनादेव चेतनेतरचेतनम् । जलेऽग्निरिव चिज्जाड्ये नातो भिन्ने मनागपि ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म में जयत्‌ का अपलाप चिद्ध करने के निमित्त उसकी जडता का खण्डन करने के लिए जड़रूप से अभिमत जगत्‌ की चिद्रपता का अनुभव कराते हैं । हे विद्याधर,चेतन से भिन्न माने गये इस जगत्‌ के स्फुरण को तुम चेतन से ही उत्पन्न जानो क्योकि चेतनता स्फुरणरूप ही होती है (८) । जैसे जल में प्रतिबिम्बित अग्नि जल से भिन्न नहीं है वैसे ही यह जगत्‌ भी चेतन से भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं है। अतः चैतन्य और जाड्य ये दोनों तनिक भी भिन्न नहीं हैं यानी जल की शीतलता से अलग प्रतिबिम्बभूत अग्नि की गरमी की नाई चैतन्य से तनिक भी अलग जाड्यनाम की कोई दूसरी वस्तु नहीं है

सर्ग सन्दर्भ

नौवाँ सर्ग समाप्त दसवाँ सर्ग निर्विकार ओर कारणशून्य ब्रह्म ही यह सब स्थित है,यह जगत्‌ कभी कहीं नहीं था, यह वर्णन ।