Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
न कारणं विनोदेति जलात्फेनलवो यथा ।
न कारणं विनोदेति सर्गादि ब्रह्मणस्तथा ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
वास्तविक द्वष्टि से तो माया के अस्नत्त्त होने के कारण निर्विकार अद्वितीय वस्तु में किसी तरह
का क्षोभ और उसका हेतु न होने से जड़ सृष्टि की उत्पत्ति की संभावना ही नहीं है, यह कहते हैं /
कारण के बिना जैसे जल में फेन का लेश उदित नहीं होता, वैसे ही कारण के बिना ब्रह्म
से सर्ग आदि भी उदित नहीं होता