Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अस्वत्वाभावयोर्नित्येऽनन्तेऽत्यन्तमसंभवात् ।
स्वत्वभावेषु सिद्धेषु स्वभावोक्तिर्न तिष्ठति ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यावर्त्य पदार्थ की प्रश्निद्धि न रहने से भी स्व“ और अभाव" इन दोनों पर्दो का सघटन नहीं
कैठता, यह कहते हैं ।
नित्य, अनन्त परब्रह्म में अस्वत्व और अभाव इन दोनों का अत्यन्त सम्भव न होने से स्वतःसिद्ध
अव्यावर्तक स्वत्व ओर भावों में व्यवहृत स्वभाव शब्द का प्रयोग लोक में नहीं बैठता । कहने का
तात्पर्य यह है कि स्वभाव शब्द का जो तात्त्विक अर्थ है वह लोक में बिलकुल नहीं घटता