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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

भेदो जगद्ब्रह्मदृशोरभेदः पर्यायशब्दार्थविलासतुल्यः । संकल्पमात्रं कथितो न सत्यो यथानयोर्वै कटकत्वहेम्नोः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसर द्रष्टि से जैसे जाज्य वित्स्वभाव को ग्राप्त है वेंसे ही जीव और जयत्‌ का भेद भी अभेवस्वरूपता को ही ग्राप्त हैं, यही दिखलाने के लिए छुवर्ण और कटक में अभेद दरष्टान्त पहले अनेक बार कहे जा बुके हैं; इसी अभिप्राय से अब उपसंहार भी करते हैं । जगत्‌ और ब्रह्मदृष्टि में जो भेद प्रतीत हो रहा है वास्तव में वह अभेद ही है। जगत्‌ और ब्रह्म ये दोनों पर्यायशब्दों के अर्थविलास के तुल्य हैं । "राहू का सिर' इस व्यपदेश के सदृश संकल्पमात्र ही इस भेद को विद्वानों ने कहा है, सत्य नहीं कहा है । जैसे सुवर्णं ओर कटक में अभेद है, वैसे ही जगत्‌ और ब्रह्म इन दोनों में अभेद है