Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अभावसव्यपेक्षस्य भावस्यासंभवादपि ।
पदं बध्नन्ति नानन्ते स्वभावाद्या दुरुक्तयः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यावर्तक में स्व शब्द का अरस्नंघटन कहकर भाव शब्द का अर्रंघटन भी दिखलाते हैं /
अभाव की अपेक्षा रखनेवाले 'भाव” का भी सम्भव न होने से अनन्त परब्रह्म में स्वभाव आदि
दुरुक्तियाँ अपना पैर नहीं जमा सकती