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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

ज्ञोऽसि किंचिन्न किंचिद्वा निःशङ्कमलमास्यताम् । अचेतनाचिदाभासे शाम्यतामात्मनात्मनि ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे विद्याधर, तुम ज्ञानरूप हो, किसी एक विशेषरूप का निश्चय न होने से सबमें अनुगत सत्तासामान्यस्वरूप होने के कारण तुम किंचिद्रूप तो अवश्य ही हो तथा विशेष का बाध होने पर सत्तासामान्य की भी निवृत्ति हो जाने से एवं एकरूप का निश्चय हो जाने से किंचिद्रूप भी नहीं हो । हे विद्याधर, बुद्धि तथा चिदाभासशून्य इस आत्मा में अपने-आप शान्त हो जाओ