Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणः कः स्वभावोऽसाविति वक्तुं न युज्यते ।
अनन्ते परमे तत्त्वे स्वत्वास्वत्वात्यसंभवात् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
तव तो ऐसी दशामें ब्रह्म का निथ्यासर्गही स्वभाव काहिये, हानि क्या है इस आशंका पर नहीं
यह कहते हैं।
ब्रह्म का क्या स्वभाव (&) है, यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता, क्योकि अनन्त परम
ब्रह्मतत्त्व मेँ स्वत्व और अस्वत्व दोनों का रहना अत्यन्त असंभव है