Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 67
छासठवाँ सर्ग समाप्त सड़सठवाँ सर्ग समाधि में स्थित भिक्षु का देहनाश ओर भिक्षुभ्रम के सदृश दूसरे जीवों को बन्धप्राप्ति और तत्त्वज्ञान से बन्ध की निवृत्ति-यह वर्णन ।
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- Verse 1राजा दशरथजी ने कहा : हे मुनिनायक, आप आज्ञा दीजिए, जिससे कि मेरे भेजे हुए ये मन्त्री आदि ज…
- Verse 2उसके लिए आज का ही दिन विदेहमुक्त के लिए निश्चित है, यह जो मेने पहले कहा था, उसे भूलकर आप…
- Verse 3तब वह आपके सत्यसंकल्प के प्रभाव से जी जाय ? महाराज, उस भिक्षु का तो जीव अब ब्रह्मदेव का स…
- Verses 4–6उस भिक्षु ने अपने सेवकों को यह आज्ञा दी है कि कोई मासभर घर का सिक्रड़ मत खोले, अतः उन सेव…
- Verses 7–12प्रासंगिक प्रश्न कहकर अब प्रस्तावित विषय का ही अवलम्बन करते है । यह त्रिगुणात्मिका माया भ…
- Verses 13–18समष्टि हिरण्यगर्भ का यह जगद्रूप सर्ग केवल मनोनिर्मित होने के कारण जब स्वप्नरूप ही सिद्ध ह…
- Verses 19–22सकता है; परन्तु) जीवलोक तो आत्मभूत अभय ब्रह्म के मूर्त-अमूर्त-स्वरूप जगद्रूपों में स्थित…
- Verse 23शंका हो कि करोड़ों कुदारियों से भी दुर्भेद्य यह जगत् भला एकमात्र बोध से कैसे विलीन हो जा…
- Verses 24–26वे कल्पित है, यह भी कैसे जाना ? ऐसी शंका होनेपर "तत््वद्ष्टि से दिखाई न पड़ने से ही" यह स…
- Verse 27वस्तु की सत्ता जैसी है वह उसी रूप में है, कोई भी उसे बदल नहीं सकता, यो महाराज वसिष्ठजी प्…
- Verses 28–29उसी निःशंकता की सामर्थ्य से जाग्रत् आदि सभी अवस्थाओं के द्वैत का बाध प्रवृत्त हुआ है। इस…
- Verses 30–36केवल बोध से चित्त-प्राणादिस्पन्द की निवृत्ति कैसे होगी ? यदि ऐसी शंका हो तो इस पर उसके हे…