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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verses 4–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 4-6

संस्कृत श्लोक

तद्गृहे मासपर्यन्ते बलान्निष्कासितार्गलाः । अन्तराले तु तिष्ठन्ति भृत्या भिक्षुदिदृक्षवः ॥ ४ ॥ ततो नष्टाङ्गसंधानं कायं निष्काल्यते जले । त्यक्ष्यन्त्यन्यं करिष्यन्ति भिक्षुमक्षुण्णमानसम् ॥ ५ ॥ अनेनैवं सदेहेन भिक्षुर्मुक्तो व्यवस्थितः । कथं प्रबोध्यते नष्टं तद्विहारे शरीरकम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

उस भिक्षु ने अपने सेवकों को यह आज्ञा दी है कि कोई मासभर घर का सिक्रड़ मत खोले, अतः उन सेवकों द्वारा दृढ़ सुरक्षित होने के कारण आपके मन्त्री आदि वहाँ जाकर कुछ भी नहीं कर सकते। उसकी कुटी में मास के आखिरी दिन में उसकी आज्ञा के अनुसार सिक्कड़ खोलनेवाले, बाहर द्वार के अन्तराल में भिक्षु शरीर देखने की इच्छा कर रहे उसके सेवक बैठे हुए हैं तदनन्तर मास के अन्त में अंगों की सन्धियों से शिथिल हुए शरीर को कुटी से बाहर निकालकर वे सेवक उसे जल में डूबा देंगे और कुटी के भीतर उसके शरीर के सदृश पत्थर-प्रतिमारूप, दृढ़ और मनःकल्पित देवतारूप दूसरे भिक्षु की प्रतिष्ठा करेगे । राजन्‌, उक्त रीति से जब इस शरीर से मुक्त होकर वह भिक्षु अवस्थित है, तब भला प्राण, चेष्टा आदि व्यापारो से शून्य (मृत) उस शरीर को किस तरह प्रबोधित करेगे ?