Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verses 7–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, verses 7–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 7-12
संस्कृत श्लोक
एषा गुणमयी माया दुर्बोधेन दुरत्यया ।
नित्यं सत्यावबोधेन सुखेनैवातिवाह्यते ॥ ७ ॥
असत्येव कृतारम्भा हेम्नः कटकता यथा ।
प्रतिभासविपर्यासमात्रकारणकोदया ॥ ८ ॥
परमात्मनि वाचेयमित्थं मायानुमीयते ।
तरङ्गालीव पयसि प्रेक्षामात्रविनाशिनी ॥ ९ ॥
ज्ञो हि दृश्यतया दीर्घस्वप्नात्स्वप्नान्तरं व्रजेत् ।
एवं जीवत्वमायाति विवेकात्सर्वमात्मदृक् ॥ १० ॥
यो यस्य प्रतिभासः स्यादात्मैव स स्वबोधतः ।
स एवोदेति संसारः करञ्जवनगुल्मदृक् ॥ ११ ॥
प्रत्येकं भूतमुदितं कृतं संसारमण्डलम् ।
भिक्षोः स्वप्नान्तर इव परां भङ्गिमिवाम्भसः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रासंगिक प्रश्न कहकर अब प्रस्तावित विषय का ही अवलम्बन करते है ।
यह त्रिगुणात्मिका माया भ्रान्तियों की जननी विक्षेपशक्ति से किसी भी तरह पार नहीं की जा
सकती । सदा-से ही एकमात्र सत्यतत्त्व के साक्षात्कार से सुखपूर्वक दूर की जा सकती हे । माया स्वरूप
से असद्रूप ही है और जगद्रूप कार्य का निर्माण करती है । जिस प्रकार सुवर्णं की कटकरूप से
विपरीतरूपता होती है, उसी प्रकार प्रतिभास की जो विपरीतरूपता है, उसीके कारण उससे जगद्रूप
विभ्रम का उदय होता हे । "वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् (घट आदि विकार केवल
वाणीमात्र ही है, मृत्तिका ही सत्यरूप है) इस दृष्टान्तरूप श्रुतिवचन से दार्ष्टान्तिक यह माया परमात्मा
में मिथ्यास्वरूप ही अनुमित होती है, इस प्रकार की अनुमित यह माया केवल तत्त्वसाक्षात्कार से जल
में तरगों की नाई, तत्क्षण विलीन हो जाती हे । अविवेक के कारण परमात्मा एक दीर्घस्वप्न से दूसरे
दीर्घस्वप्न की ओर जाता है ओर जीवरूप बन जाता हे । अपने विवेक से सबको अपना स्वरूप समझकर
चिन्मात्ररूप हो जाता है। अपने तत्त्वसाक्षात्कार से जो जिसका प्रतिभास रहता है, वह आत्मस्वरूप
ही बन जाता है और अपने तत्त्वज्ञान के न रहने से वही प्रतिभास, करंजवन के पौधों के सदृश,
संसाररूप से उदित हो जाता हे प्रत्येक प्राणिसमुदाय के प्रति यह संसारमण्डल उस प्रकार भ्रान्ति
से उदित होता है, जिस प्रकार भिक्षु के स्वप्न के अन्दर एक स्वप्न से दूसरा स्वप्न और जल में एक
तरंग से दूसरा तरंग उदित होता है