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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verses 19–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, verses 19–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 19-22

संस्कृत श्लोक

चित्तेति परमात्मा न परमात्मा न वा न किम् । जीवदेहादिनाम्नोऽस्य प्रतिबिम्बादिवार्हता ॥ १९ ॥ ब्रह्मण्येव परं ब्रह्म जगदृष्ट्यैव संस्थितम् । शुद्धाकाशमिवाकाशे जले जलमिवामलम् ॥ २० ॥ लोको ब्रह्मण एवायं जगद्रूपेषु तिष्ठति । बिभेत्यन्यतया बोधात्प्रतिबिम्बादिवार्भकः ॥ २१ ॥ स्पन्देऽस्पन्दीकृते चेह स्वतः संज्ञा विलीयते । साप्यलं परिणामेन लीयतेऽग्नौ घृतं यथा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

सकता है; परन्तु) जीवलोक तो आत्मभूत अभय ब्रह्म के मूर्त-अमूर्त-स्वरूप जगद्रूपों में स्थित हे, इसलिए इसमें अन्यथाभरम की संभावना ही नहीं है, तथापि “आत्मा से अन्य यह सब मेरे भय का कारण है" यों भ्रम कर यह इस प्रकार डरता है, जिस प्रकार बालक परछाई से उरता हे । ओर भेदज्ञान में बुद्धि का स्पन्दन कारण हे, अतः समाधि के अभ्यास द्वारा बुद्धिस्पन्द के स्पन्दरहित कर दिये जानेपर भेदबुद्धिस्वरूप संज्ञा अपने-आप ही बुद्धि मेँ विलीन हो जाती हे । और वह बुद्धि भी पूर्णब्रह्माकार चरमसाक्षात्काररूप अपने परिणाम के द्वारा, अग्नि में हवन किये गये धी की तरह, उसीसे दीप्त ब्रह्म मेँ विलीन हो जाती हे