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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verses 13–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, verses 13–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 13-18

संस्कृत श्लोक

प्रस्तुतः पद्मजादेव जगत्स्वप्नो यथोदितः । तथैवास्वच्छचित्तोत्थो रूढः सर्वजनं प्रति ॥ १३ ॥ पितामहवदाभाति सर्गः स्वप्नविलासवत् । प्रत्येकमुदितस्तेन ब्रह्माण्डानीव कोटिशः ॥ १४ ॥ स्फुरन्यथा तथा वास्मिञ्जीवः पश्यति विभ्रमम् । हृदयेऽयं समर्थं च स्वप्नवद्दीर्घमान्तरम् ॥ १५ ॥ चित्सत्तामात्रमासाद्य प्रतीतिच्युतमात्रतः । जरामरणदुःखानां क्वचिद्भाजनतां गतः ॥ १६ ॥ पातालं ब्रह्मलोकं वा चित्तत्सुकृतशालिनी । चित्तांशस्पन्दमात्रेण कृत्वा कृत्वेव संस्थिता ॥ १७ ॥ चित्स्पन्दरूपिणी जीवनामरूपं गतात्मनि । अन्यत्र च विलुठति गत्वा संभ्रमहारिणी ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

समष्टि हिरण्यगर्भ का यह जगद्रूप सर्ग केवल मनोनिर्मित होने के कारण जब स्वप्नरूप ही सिद्ध है तब व्यष्टिजीव का भी यह सर्ग स्वप्नरूप ही सिद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं। परन्तु केवल अस्वच्छ चित्त से उत्पन्न होने के कारण व्यष्टि को वह दीर्घ एवं स्थिर-सा भासता है। भद्र, प्रस्तुत जगद्रूप स्वप्न हिरण्यगर्भ से जैसा ही उदित है वैसा ही समस्त व्यष्टिजनों के प्रति अस्वच्छ चित्त से उत्पन्न हुआ जगत्‌-स्वप्न अवस्थित है । श्रीरामजी, पितामह के चित्त के सदृश चित्तशुद्धि होने पर तो यह सृष्टि स्वाप्निक विलास के समान असद्रूप चारों ओर से भासती है, यों उस तरह के भान से जाना जाता है। इसीसे यह निश्चय होता है कि यह प्रत्येक सर्ग ब्रह्माण्डों के समान करोड़ों रूपों मे उदित हुआ है । यह जीव व्यष्टि-प्रपंचरूप से, समष्टि-प्रपंचरूप से अथवा साधारण-प्रपंचरूप से या प्रत्येक असाधारण-प्रपंचरूप से चाहे जिस किसी रूप से स्फुरित हो, तथापि इस हृदय में प्रतिभान के समर्थ, दीर्घ भीतरी विभ्रम को देखता है, इसलिए वह स्वप्न की नाई मिथ्या ही है। अपने पारमार्थिक स्वरूप से च्युत हुआ यह जीव एकमात्र चितिसत्ता का अवलम्बनकर किसी देव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि की देहों मे जरा, मरण आदि दुःखों का भागी बन जाता है। उस स्वप्न में चित्र-विचित्र कर्मोवाली यह जीवचिति अपने चित्तांश के स्पन्दमात्र से नीचे पाताललोक या ऊपर ब्रह्मलोक की रचनाकर भोगों का उपभोग कर रही-सी स्थित है । परमात्मचिति ही प्राण की कल्पना से उसके अधीन स्पन्द से युक्त होकर उसीके द्वारा जीवनामक स्वरूप में परिणत होती है । उस प्रकार जीवरूप में परिणत हुई वह अपने भीतर देहाकार भ्रम और बाहर विषयाकार भ्रम को धारण करती हुई इधर-उधर लुढ़कती फिरती है