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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

चित्स्पन्द एव चित्स्पन्दे सर्वात्मनि विजृम्भितः । स्पन्दास्पन्दौ जृम्भणादि कल्पितं नात्र वास्तवम् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

शंका हो कि करोड़ों कुदारियों से भी दुर्भेद्य यह जगत्‌ भला एकमात्र बोध से कैसे विलीन हो जाता है ? तो इस पर वह असद्रूप चितिस्पन्दन होने से ही“ यह समाधान करते हैं। सर्वात्मक चितिस्पन्द मेँ ही चितिस्पन्दरूप जगत्‌ विकसित हुआ है । इसमें स्पन्दन, स्पन्दनाभाव, विकास आदि कल्पित ही है, तात्तिवक नहीं