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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

नानातैवास्य बोधेन स बोधस्त्वनवेक्षणात् । पृच्छकं चैवमस्त्येव तस्मान्निःशङ्कता परा ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

वस्तु की सत्ता जैसी है वह उसी रूप में है, कोई भी उसे बदल नहीं सकता, यो महाराज वसिष्ठजी प्रतिज्ञा करते हैं। श्रीरामजी, आप स्वस्वरूप के अज्ञान से ही नानारूप हैं। आप अज्ञानस्वरूप नानात्व को न देखने पर तो पूर्ण चिद्रूप ही हैँ । इस विषय में जिसे चाहें, पूछिए | यही परमार्थ सत्य है । इसलिए आपकी, मेरी और अन्य की सर्वथा निःशंकता सिद्ध ही हे