Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verses 30–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, verses 30–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 30-36

संस्कृत श्लोक

स्पन्दोऽप्यस्पन्द एव स्यान्निःसंकल्पतया च ते । न स्पन्दास्पन्दयोर्भिन्ना संकल्परहितैव चित् ॥ ३० ॥ द्वैतैक्यविकला रूपसंकल्पश्चिदभावनात् । स च भावनमात्रेण गतो ब्रह्मैव शिष्यते ॥ ३१ ॥ चिच्चन्द्रबिम्बे संकल्पकलङ्कः स्फुरतीव यः । नासौ कलङ्कस्तद्विद्धि चिद्धनस्य घनं वपुः ॥ ३२ ॥ चिद्धनस्य न सन्नासन्स्थीयतां यत्तते पदे । इत्यदोषमहाबोधसारसंग्रहणं कृतम् ॥ ३३ ॥ चिच्चन्द्रबिम्बासंकल्पकलङ्कामृतविग्रहः । त्वया भव्येन संस्पृष्टो भावाभावक्षयात्मना ॥ ३४ ॥ भावाभावादिकलनां नीत्वा चिन्मयतां चितः । समोल्लासविलासान्तः समाश्वस यथासुखम् ॥ ३५ ॥ स्पन्दास्पन्दौ कल्पनाकल्पना वा चित्ताम्नायो विद्धि नामाब्धिनाम्ना । सर्वाकारा निर्वृतिः शान्तिसत्ता पूर्णापूर्णे ह्येकमेवास्थितेति ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल बोध से चित्त-प्राणादिस्पन्द की निवृत्ति कैसे होगी ? यदि ऐसी शंका हो तो इस पर उसके हेतुरूप संकल्प के क्षय से ही - यह समाधान करते हैं। राजन्‌, आपके संकल्पशून्य हो जाने से स्पन्द भी स्पन्दशून्य ही सिद्ध हो जायेगा, क्योकि संकल्पशून्य चिति स्पन्द ओर अस्पन्द से भिन्न कदापि नहीं है । चिति के अदर्शन से द्वतता और एकतारूप संकल्प उदित होता है और वह संकल्प चिति के दर्शनमात्र से नष्ट हो जाता हे, यों द्वैतता ओर एकता से रहित ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है । भद्र, चितिरूपी चन्द्रबिम्ब में जो एक तरह का संकल्परूपी कलंक स्फुरित हो रहा है, वह कलंक नहीं है; किन्तु चिदैकरस का घन शरीर है, यह आप जान लीजिये | हे श्रीरामचन्द्रजी, आप चिद्घन के विस्तृत पद में स्थित हो जाड्ये, क्योकि आपके पूर्णरूप में स्थत हो जाने से संकल्पादि आपके साथ ऐक्य प्राप्तकर अलग अपना अस्तित्व नहीं रख सकते, यों आपके रूप से तो अपना अस्तित्व रखते ही है, इसी युक्ति से आत्मा के साथ सम्पूर्ण वस्तुओं में एकत्व का सम्पादन करनेवाले निर्दोष महा बोधसार का आप भलीभाँति अवलम्बन कीजिये । हे चितूचन्द्रविम्ब, हे असंकल्पकलंक, भावाभावनाशस्वरूप भव्य बने हुए आपके द्वारा स्पृष्ट सब पदार्थ अमृतरूपी शरीरवाला हो जाता है । अहो, आपका माहात्म्य कैसा है । भद्र, आप चिति की भाव ओर अभाव स्वरूप कल्पना को चिन्मयरूप बना कर तथा अपने हृदय में उल्लास ओर विलास को एक-सा करके सुखपूर्वक विश्राम कीजिये । स्पन्द ओर अस्पन्द या संकल्प ओर विकल्प इत्यादि चित्त की भ्रान्ति का जितना भेद है सर्वाकारात्मक सुखैकरस शान्तिसत्ता ही तत्‌-तत्‌ आकार से अवस्थित है । इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, आप आनन्दसागरनामक स्वरूप से स्थित हो करके ये पूर्ण ओर अपूर्ण जो दो दशाएँ हैं, इन्हें अपना एक ही रूप समञ्िये