Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 48
18 verse-groups
- Verse 1सैंतालीसवाँ सर्गे अड़तालीसवाँ सर्ग कल्पित जगत् में जिसकी सत्तास्पूर्ति ओर आनन्द प्रतिबिम…
- Verse 2विचित्र भोगों के आकार से), स्फटिक, दर्पण आदि में चन्द्रबिम्ब की नाईं, निरतिशय आनन्द के अस…
- Verse 3उस तत्त्व के सद्भाव में सर्वसाधारणरूप से अनुमानप्रमाण बतलाकर अब विद्वानों का अनुभवरूप प्र…
- Verse 4तब सभी लोग क्यो उसका अनुभव नहीं करते ? यदि ऐसी शंका हो तो उसका समाधान यह है कि दृश्य और द…
- Verses 5–6यह तो उनके लिए कहा गया है, जो छठी आदि भूमिकाओं में नहीं पहुँचे हुए हैँ । छठी ओर सातवीं भू…
- Verse 7जैसे जगदीश्वर भीतर सर्वदा ही अपने स्वरूपानन्द में स्थित होता हुआ भी बाहर माया द्वारा जगत्…
- Verse 8उन लोगों के व्यवहार में बाह्य विषयों में बुद्धिवृत्तियों का संगम होने पर भी त्रिपुटी में…
- Verse 9उन महात्माओं का भीतरी स्वरूपद्ुख तो युतां विक्षेपरहित है, इस विषय में भी दृष्टान्त बतलाते…
- Verse 10आत्मा का वह शुद्ध चिद्रूप न तो दृष्टि का विषय है और न उपदेश के ही योम्यहे, न तो अत्यन्त स…
- Verse 11वही रूप देह आदि समस्त उपाधियों से विनिर्मुक्त आत्मतत्व है, यह कहते हैं। शुद्ध चिदात्मा का…
- Verse 12वह रूप न सद्रूप है, न असद्रूप है और न सत् एवं असत् के मध्यवर्ती यानी अनिर्वचनीय ही है।…
- Verse 13उपर्युक्त देह आदि समस्त पदार्थो से ब्रह्म विनिर्मुक्त है ओर अनन्त भूत एवं भावी देह-कोशों…
- Verse 14इसी प्रकार कार्य-कारण से विलक्षण उसकी संभावना करनी चाहिए, यह कहते है । वह ब्रह्म न महाकल्…
- Verse 15यदि शका हो कि देहादि विकारों से उसमें अनुगत सद्रूप ब्रह्म का भी विकार क्यो नहीं होता ? तो…
- Verse 16तब क्या देह आदि ब्रह्म से पृथक् हैं ? इस पर नहीं” ऐसा कहते है। आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ…
- Verse 17श्रीरामचन्द्रजी, चारों ओर से श्रवण, मनन आदि उपायों से परिष्कृत बुद्धि से आपने यह विश्व आत…
- Verses 18–19इसीलिए व्यवहार करते हुए भी आप निर्विकार आत्मा के दर्शन से (साक्षात्कार से) नित्यमुक्तस्वर…
- Verse 20श्रीरामजी, "काल, क्रिया, करण, कर्ता, कारण, कार्य, जन्म, स्थिति, प्रलय, स्मरण आदि सब जगत्…