Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
इह चामुत्र सद्रूपादन्यथा भवति क्वचित् ।
जायन्ते च म्रियन्ते च देहकुम्भाः सहस्रशः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शका हो कि देहादि विकारों से उसमें अनुगत सद्रूप ब्रह्म का भी विकार क्यो नहीं होता ? तो
इस पर कहते है ।
ये हजारों देहरूप घडे उत्पन्न होते हैं और नष्ट भी होते हैं, किंतु बाहर एवं भीतर व्याप्त इस
आत्मस्वरूप आकाश का खण्डन यानी नाश नहीं होता