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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

चित्तचेत्यसमासङ्गत्यागे ते स्वपदे स्थिताः । स्पन्दात्संसाधयन्त्यर्थं तेनांशेनेश्वरो यथा ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे जगदीश्वर भीतर सर्वदा ही अपने स्वरूपानन्द में स्थित होता हुआ भी बाहर माया द्वारा जगत्‌ की व्यवस्था का पालन करता है; वैसे ही षष्ठादि भूमिकाओं में पहुँचे हुए योगीजन भीतर ब्रह्माकार अखण्डवृत्ति-धारारूप स्पन्द से उसी अंश द्वारा निरतिशय आनन्द का आस्वादनस्वरूप परमपुरुषार्थ जिस प्रकार साधते हैं, उसी प्रकार बाहर भी चित्त, चेत्य आदि के स्पन्दन से व्यवहार-मर्यादा को चलाते ही हैं