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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

न जीवो नापि च स्पन्दो न संवित्तिर्न वै जगत् । न सन्नासन्न मध्यं च शून्याशून्यं न चैव हि ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

वह रूप न सद्रूप है, न असद्रूप है और न सत्‌ एवं असत्‌ के मध्यवर्ती यानी अनिर्वचनीय ही है। वह न तो शून्यस्वरूप है और न अशून्यस्वरूप ही है । वह देश, काल एवं वस्तु से जनित परिच्छेद आदिरूप भी नहीं है, किंतु ब्रह्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न कुछ नहीं है