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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

यत्रैतत्स्पन्दते दृश्यं तत्तदात्मपदं भवेत् । यच्च नाद्यं न कल्पान्तं न वस्त्वाद्यनिलादिभिः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार कार्य-कारण से विलक्षण उसकी संभावना करनी चाहिए, यह कहते है । वह ब्रह्म न महाकल्प के आदिकाल में विद्यमान अव्याकृत नामक कारणरूप है और न प्राकृतादि प्रलयस्वरूप ही है | सृष्टिकाल में भी इहलोक अथवा परलोक में वायु, अग्नि आदि से जनित शोषण, दहन, क्लेदन, भेदन आदि विकारों से कहीं भी सद्रूप से च्युत न होने के कारण वह सविकारवस्तुरूप और विकाररूप भी नहीं हे