Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verses 5–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

नास्थिता भावना येषां स्थितानामपि कर्मसु । संवित्संवेद्यसंबन्धस्पन्दत्यागे च ये स्थिताः ॥ ५ ॥ प्राणो न स्पन्दते येषां चित्रस्थवपुषामिव । मनो न स्पन्दते येषां चित्रस्थवपुषामिव ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यह तो उनके लिए कहा गया है, जो छठी आदि भूमिकाओं में नहीं पहुँचे हुए हैँ । छठी ओर सातवीं भूमिका में पहुँचे हुए योगी लोग तो व्यवहार करते हुए भी पूर्व भूमिकाओं मे प्राप्त हुए योगियों के समान आत्म-सुख का सर्वदा ही स्वाद लेते हैं, यह कहते हैं। व्यवहार में निरत भी छठी आदि भूमिकाओं में स्थित जो लोग बाह्य विषयों मेँ सत्यता की भावना तनिक भी नहीं करते, पूर्व भूमिकाओं में स्थित जो पुरुष विषयेन्द्रिय-सम्बन्धों के परित्यागरूप समाधि में निरत है, चित्रलिखित देहधारियों की नाई जिनका प्राणस्पन्द नहीं होता और चित्रलिखित देहधारियों की नाई जिनका मन भी गतिशील नहीं रहता; वे सब उस अपने भूमानन्दपद में जिसमें कि चित्त एवं चेत्य की आसक्ति का त्याग है-समान रूप से स्थित हैं