Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
केवलानुभवप्राप्यं चिद्रूपं शुद्धमात्मनः ।
न देहो नेन्द्रियप्राणौ न चित्तं न च वासना ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
वही रूप देह आदि समस्त उपाधियों से विनिर्मुक्त आत्मतत्व है, यह कहते हैं।
शुद्ध चिदात्मा का अनुभवगम्य वह रूप न देहस्वरूप है, न इन्द्रिय एवं प्राणरूप है, न चित्तस्वरूप
है न वासनारूप है, न जीवरूप है, न स्पन्दस्वरूप है, न ज्ञानरूप है ओर न जगद्रूप ही है