Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यत्रानुदितरूपात्म सर्वमस्तीदमाततम् ।
मयूर इव बीजेऽन्तस्तदहंतादिगादि च ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सैंतालीसवाँ सर्गे
अड़तालीसवाँ सर्ग
कल्पित जगत् में जिसकी सत्तास्पूर्ति ओर आनन्द प्रतिबिम्बित होते हैं,
सच्चिदानन्दघन उस ब्रह्म का असाधारणरूप से वर्णन ।
मयूराण्ड-रस के दुष्टान्त से किसी को यह भ्रम न हो जाय कि जिसके गर्भ में जगद्रूप वैचित्र्य
तिरोभूत है, ऐसा चित् ओर अचित् से संवलित, बीजशक्ति से युक्त अव्याकृत ही परमतत्त्व यानी ब्रह्म
है, उससे ऊपर कोई दूसरा शुद्ध-तत्त्व नहीं है-इसलिए निर्विशेष भूमानन्दरूप जगत् के उस अधिष्ठान
का असाधारणरूप से परिचय कराने के लिए महाराज वसिष्ठजी कहते है ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, मयूराण्ड के भीतर मयूर की नाई पूर्व में वर्णित भीतरी
अहंता आदि ओर बाह्य दिशा आदिरूप यह सब व्यापक जगत् जिस शुद्ध पदार्थ में तीनों काल में भी
अनुत्पन्नस्वरूप होकर स्थित हे । (वही तत्त्व मेरे द्वारा दिये गये मयूराण्डरस दृष्टान्त के तात्पर्य का
विषय है, न कि मायाशबल अव्याकृत, यह आप जानिए)