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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 44

तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त चौवालीसवाँ सर्म ज्ञान की दृढता के लिए इच्छा -त्याग से लेकर मनोविनाशपर्यत आसक्तिविनाश के उपायों का कथन |

33 verse-groups

  1. Verse 1यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी ने स्वकीय तत्त्वज्ञान-निष्ठा का वर्णन कर दिया तथापि उसकी परिपक्र-…
  2. Verse 2विषय तो नियमतः तुष्टि के साधन हैं, अतः उनमें राग का परित्याग कैसे किया जा सकता है ? इस आश…
  3. Verse 3इसी से चिर-कालिक अनर्थ देनेवाले क्षणिक सुख मे आसक्ति करना भी ठीक नहीं है, यह कहते हैं । ज…
  4. Verse 4जब विषय की प्राप्ति से जनित क्षणिक भी इच्छानियोध सुख का हेतु है तव इच्छा का आत्यन्ति उच्छ…
  5. Verse 5महाराज, मैंने तो पूणनिन्द पद प्राप्त कर लिया है, फिर मुझे विषयाभिलाषात्याग का जो आप उपदेश…
  6. Verse 6हे श्रीरामजी, आपने आत्मज्ञानरूपी पर्वत की चोटी पर विश्राम कर लिया है, अतः अहंभावरूपी महाग…
  7. Verse 7ढता होने पर भी पुनः फस जाने की आशंका क्यो नहीं करते हैं, इस पर कहते हैं । उस प्रकार की आश…
  8. Verse 8अथवा दूसरों के उपकार के लिए मैंने फिर यह उपदेश दिया है, आपका तो अज्ञान नष्ट हो चुका है, य…
  9. Verse 9हे सौम्य श्रीरामजी, अपने चैतन्यस्वभाव में भलीभाँति अवस्थित हुए आप मानों मुझे यह प्रत्यक्ष…
  10. Verse 10भद्र, अनासक्ति से जी रहे आपकी आशा निराशा में परिणत हो जाय, भावना अभावना में परिणत हो जाय…
  11. Verse 11हम मनोरथ के विनाश से निराशत्व आदि की अभिलाषा नहीं करते, किंतु चारों ओर से निरतिशय आनन्दरू…
  12. Verse 12हे श्रीरामचन्द्रजी, आपको यदि आत्मा अज्ञात है तो आप पूरी तरह से बद्ध है और यदि आत्मा विज्ञ…
  13. Verse 13अब वासनाशून्यता का स्वानुभवगम्य लक्षण बतलाते हैं। जिस दशा में आत्मा भोगसुख का आस्वाद नहीं…
  14. Verse 14हे रामभद्र, आप भीतर से वासनारहित इन्द्रियों द्वारा व्यावहारिक क्रियाएँ कीजिए । एेसा करने…
  15. Verse 15शान्तात्मा होकर आप ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेयरूप इन तीनों को और दुःख आदि को भी उक्त त्रिपुटी…
  16. Verse 16अथवा दुःख आदि में प्रतिकूलत्व की कल्पना मनोजनित ही है, इसलिए भुशुण्डोक्त युक्ति से मन का…
  17. Verse 17प्राण के उन्मेष और निमेष से संसार का उदय और अस्त होता है, इसलिए उसे अभ्यास और प्रकृष्ट यो…
  18. Verse 18अथवा प्रवृत्ति द्वारा अज्ञान ही सब अनर्थो का निदान है, इसलिए दृढ़ आत्मज्ञान से उसीका निरा…
  19. Verse 19“वित्तोन्मेषनिमेषाभ्याम्‌“ इससे जो अर्थ कहा गया था, उसका दृष्टान्त से स्पष्टीकरण करते है…
  20. Verse 20उक्त अर्थ में अन्वय-व्यतिरेक दिखलाते है । रामभद्र, दृश्य और दर्शन के सम्बन्धरूप स्पन्दन स…
  21. Verse 21दृश्य ओर दर्शन के सम्बन्धरूप स्पन्दन का अभाव होने पर हृदय में जगत्रूप आभास की भावना उस प्…
  22. Verse 22चित्त के स्पन्दन से जनित माया चित्तस्पन्दन का अभाव होने पर उस प्रकार विलीन हो जाती है, जि…
  23. Verse 23वासनांश के त्याग से, बोध से अथवा प्राण के निरोध से चित्त के स्पन्दनरहित हो जाने पर कूटस्थ…
  24. Verse 24वृत्तिरूप चित्त-स्पन्दन के अभावमात्र से अथवा प्राण के निरोध से चित्त अचित्तरूपता प्राप्त…
  25. Verse 25बोधाद्रा" इससे जो मध्यम उपाय कहा गया था, उसका विवरण करते हैं। विषय और इन्द्रियों का सम्बन…
  26. Verse 26जहाँ चित्त उदित नहीं होता वह सब सुख स्वाभाविक ब्रह्मसुखरूप ही हे । मरूभूमि में ठण्डे जल स…
  27. Verse 27चित्तविलय से जनित विस्फारसुख वाणी से भी नहीं कहा जा सकता, केवल अपने अनुभव से ही जाना जा स…
  28. Verse 28तत्त्वज्ञान से चित्त का अन्त होता हे । भ्रान्तिवश से ही चित्त का सद्भाव ज्ञात होता है, बा…
  29. Verse 29ज्ञानियों का भी व्यवहार दिखाई पड़ने के कारण उनका चित्त है ही, यह मानना पडेगा, फिर आप कैसे…
  30. Verse 30ज्ञानी का चित्त चित्तनाम का नहीं कहा जाता, किंतु ज्ञानी का चित्त सत्त्व कहा जाता है। जैसे…
  31. Verse 31चित्त का स्वरूप वास्तव में किसी भी काल में नहीं है, उसका स्वरूप भ्रान्तिजनित है, इसलिए उस…
  32. Verses 32–33वस्तु का तत्वज्ञान अवस्तुरूप कल्पितांशमात्र का बाधक होता है, इस प्रसिद्धि से भी सत्त्वांश…
  33. Verse 34उत्तर देते हैं। सांसारिक अवस्था में कुछ काल तक सत्त्वरूपता को प्राप्त हुआ यह चित्त तुरीया…