Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
चित्तोपशमजं स्फारमवाच्यं वचसा सुखम् ।
क्षयातिशयनिर्मुक्तं नोदेति न च शाम्यति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्तविलय से जनित
विस्फारसुख वाणी से भी नहीं कहा जा सकता, केवल अपने अनुभव से ही जाना जा सकता हे । विनाश
ओर अतिशय से विनिर्मुक्त वह अनिर्वचनीय सुख न तो उदित होता है और न प्रशान्त ही होता हे