Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
चित्तोन्मेषनिमेषाभ्यां संसारप्रलयोदयौ ।
वासनाप्राणसंरोधादनिमेषं मनः कुरु ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा दुःख आदि में प्रतिकूलत्व की कल्पना मनोजनित ही है, इसलिए भुशुण्डोक्त युक्ति से मन
का ही निरोध करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं।
मन के उन्मेष ओर निमेष से संसार की उत्पत्ति और विनाश होते हैं, इसलिए पहले वासना और
प्राण का निरोधकर तदनन्तर आप मन का निरोध कर दीजिए