Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यत्स्मृतानन्तसद्दृष्टेर्ज्ञत्वमेरुशिरःस्थितेः ।
पुनर्गर्भानुकारान्तःपाताले पतनं कुतः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
ढता होने पर भी पुनः फस जाने की आशंका क्यो नहीं करते हैं, इस पर कहते हैं ।
उस प्रकार की आशंका न करने में कारण यही है कि जिसने निरंतर असीम सदृब्रह्मदृष्टि का
स्मरण कर लिया है और तत्त्वज्ञानरूप सुमेरुपर्वत के शिखर पर स्थान पा लिया है, उस पुरुष का
गर्भानुसाररूप (गर्भ का अनुसरण कर जन्म आदि अनर्थ पैदा करनेवाले अहंभावरूप) अन्तःपाताल में
पतन कैसे हो सकता है ? दृढीभूत ज्ञान अविद्यारूपी अनर्थ बीज का अवश्य उच्छेद कर डालता है, यह
भाव है