Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
वाञ्छाकाले यथा वस्तु तुष्टये नान्यदा तथा ।
तस्मात्क्षणसुखे सक्तिं बालो बध्नाति नेतरः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी से चिर-कालिक अनर्थ देनेवाले क्षणिक सुख मे आसक्ति करना भी ठीक नहीं है, यह
कहते हैं ।
जिस तरह लाभ-काल में विषय तुष्टि के लिए होता है, उसी तरह दूसरे काल में नहीं होता ।
इसलिए बालक ही क्षणिक सुख देनेवाले विषयों मे आसक्ति बाँधता है, दूसरा नहीं