Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
यत्र नाभ्युदितं चित्तं तत्तत्सुखमकृत्रिमम् ।
न स्वर्गादौ संभवति मरौ हिमगृहं यथा ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जहाँ चित्त उदित नहीं होता वह सब सुख स्वाभाविक ब्रह्मसुखरूप
ही हे । मरूभूमि में ठण्डे जल से परिपूर्ण सरोवर की नाई वह सुख स्वार्गादि भोगभूमियों में नहीं हो
सकता, क्योकि वहाँ चित्त काम, असूया आदि से कलुषित रहता है