Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
यदि तत्पदमाप्तोऽसि कदाचित्कालपर्ययात् ।
तदहंभावनारूपे न मङ्क्तव्यं त्वया पुनः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, मैंने तो पूणनिन्द पद प्राप्त कर लिया है, फिर मुझे विषयाभिलाषात्याग का जो आप
उपदेश दे रहे हैं, वह क्या अर्थ रखता है ? इस पर कहते है।
भद्र, यदि आप तत्पद प्राप्त कर चुके हँ, तो फिर किसी समय काल के विपर्यय से आप
अहंभावनारूप कीचड़ में न फस जायें । तात्पर्य यह है कि आप कालान्तर में भी अहंभावरूपी कीचड़
में फस न जायें, इसलिए पूर्णानन्दस्वरूप पद में स्थिति की दृढ़ता के लिए मैं पुनः उपदेश दे रहा
हूँ