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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

वाञ्छाकाले तुष्टये यत्तत्र वाञ्छैव कारणम् । तुष्टिस्त्वतुष्टिपर्यन्ता तस्माद्वाञ्छां परित्यज ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जब विषय की प्राप्ति से जनित क्षणिक भी इच्छानियोध सुख का हेतु है तव इच्छा का आत्यन्ति उच्छेद निरतिशय आनन्द का हेतु है, यह तो अर्थतः सिद्ध हो ही जाता है; ऐसी स्थिति में इच्छा ही अनर्थरूप है, इस आशय से कहते है । हे रामभद्र, इच्छाकाल में जो वस्तु आनन्दसाधन प्रतीत होती है, उसमें एकमात्र कारण इच्छा ही है । परंतु वह आनन्द तभी तक बना रहता है जब तक इच्छा रहती है यानी आनन्दविरोधी अभिलाषा से ही आनन्द का विच्छेद होता हे, इसलिए आप इच्छा का परित्याग कर दीजिये