Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
मौर्ख्योन्मेषनिमेषाभ्यां कर्मणां प्रलयोदयौ ।
तद्विलीनं कुरु बलाद्गुरुशास्त्रार्थसंयमैः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा प्रवृत्ति द्वारा अज्ञान ही सब अनर्थो का निदान है, इसलिए दृढ़ आत्मज्ञान से उसीका निरास
करना चाहिए, यह कहते हैं।
अज्ञान के आगम और अपाय से कर्मो का आगम और अपाय होता है, इसलिए बल से गुरुउपदिष्ट
शास्त्रार्थं ओर संयमो से आप उसका विलय कर दीजिए