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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 42

इकतालीसवाँ सर्ग समाप्त बयालीसवाँ सर्ग ईश आदि से लेकर समष्टि -व्यष्ट्यात्मक जो संसार है, वह सब माया ही है, यह उपदेश देकर भगवान्‌ श्रीशंकर का अपने वासस्थान के प्रति गमन - यह वर्णन ।

31 verse-groups

  1. Verse 1“जीवदेतदवस्थाकं स्थितं पश्यति देहकम्‌” इस वचन से पूर्व अध्याय के अन्त में जो अध्यारोप कहा…
  2. Verse 2भगवान शंकर ने कहा : हे मुने, जिस प्रकार स्वप्नमनुष्य अतिसूक्ष्म नाड़ियों में अत्यंत विस्त…
  3. Verse 3कथित दृष्टान्त के आशय का ही पुनः विवरण करते हैं। जैसे आज भी स्वप्नमनुष्य चैतन्यघन आत्मा क…
  4. Verse 4आदि सर्ग में वही जीव समष्ट्यात्मक उपाधि से युक्त होकर हिरण्यगर्भ नाम धारण कर अपने में और…
  5. Verse 5वही सात्विक, राजस ओर तामस कल्पो मे सदाशिव आदि मूर्तियों की पहले कल्पना कर फिर दूसरों की क…
  6. Verse 6"आकाशप्रभवो ब्रह्मा“ (ब्रह्मा आकाश से उत्पन्न होता है) इस पूर्व रामायण की उक्ति से पितामह…
  7. Verse 7सूक्ष्म भूतों की सृष्टि द्वारा पुष्ट हुआ प्रथम संकल्प ही उस समध्टिव्यष्टिस्वरूप मनोमय मूर…
  8. Verse 8जिस तरह शून्यस्वरूप वेताल तात्त्विक दृष्टि से असद्रूप और भ्रमदृष्ट से सद्रूप भासता है, उस…
  9. Verse 9उक्त रीति से जो आदि पुरुष स्वरचित वस्तु के प्रति द्रष्टारूप हो जाता है, वह निमेषमात्र काल…
  10. Verse 10वह निमेष ही कल्पना में समर्थ है, जो केवल प्रतिभास के विपर्यास से यानी पराकृप्रवणता से महा…
  11. Verse 11परमाणु-परमाणु में, व्योम-व्योम में (महाकाश और सुई के छेद आदि आकाश में) तथा क्षण-क्षण में…
  12. Verse 12वे सृष्टि-भेद जितने जीवों मे समानसमय में समानविषयक वासना का प्रादुभावि होगा, उतने जीवों क…
  13. Verse 13उसमें युक्ति बतलाते हैं। चूँकि सर्गरूप से स्थित जीव के द्वारा सम्भाव्यमान होकर ही वे सर्ग…
  14. Verse 14सर्ग ब्रह्मसत्ता से निरपेक्ष होकर अपनी सत्ता से ही या देश-कालसम्बन्ध के बल से प्राप्तसत्त…
  15. Verse 15तब सभी सर्ग प्रलयपर्यन्त स्वयं ही सत्स्वरूप होंगे ? इस पर कहते हैं। ये सर्ग सत्स्वरूप नही…
  16. Verse 16सम्बन्ध नहीं करता
  17. Verse 17तव सर्ग में देश एवं काल दोनों से आक्रान्तत्व का अनुभव कैसे होता है ? इस पर कहते हैं। जैसे…
  18. Verse 18जिस तरह उन्नतरूप से अवस्थित संकल्पमय मेरूपर्वत से वास्तव में आक्रान्त न हए ही देश, काल आद…
  19. Verse 19इसीसे संकल्प के अनुसार ही पुरुष, कीट, स्थावर आदि जन्मवैचित्र्य होता है, ऐसा कहते हैं। एेह…
  20. Verse 20उसी प्रकार इस ब्रह्माण्ड मे स्थावरो की योनिर्योँ भी उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार अण्डज आद…
  21. Verse 21कोई सर्ग वासना की सूक्ष्मता के कारण परमाणु के सदृश सूक्ष्म हैं और कोई सर्ग वासना के स्वल्…
  22. Verse 22तब कैसे इस सृष्टि का उपरम होता है ? इस पर कहते है। परमार्थतत्त्व का चिन्तन करने से अनिर्व…
  23. Verse 23एक क्षण के सहस्रांश कालमात्र में भी यदि कहीं चिदात्मा बहिर्मुख हो जाय, तो करोड़ों कल्पो म…
  24. Verse 24चिति की स्वरूप प्रतिष्ठा ही ब्रह्मरूपता है, इसे कहते है । तत्त्ववेत्ता पुरुषों के द्वारा…
  25. Verse 25अभिमान की अभिवृद्धि से उत्तरोत्तर ज्यो-ज्यो सृष्टि प्रौढ़ बनती जाती है, त्यो -त्यो चिदात्…
  26. Verse 26हे प्रिय मुने, ब्रह्मचिति उपाधिवश जीवभाव को प्राप्त होकर देह, इन्द्रिय आदि के संवलन-क्रम…
  27. Verses 27–28इसीलिए दृढ़ सूत्र में गुँथी गयी माला की नाई यह विश्व सत्‌ ओर असत्‌-रूप सूत्र में गुँथा गय…
  28. Verse 29इसीलिए अपना अनुभव ही एकमात्र उसमें प्रमाण है, लौकिक प्रमाता, प्रमाण आदि की वहाँ गति है ही…
  29. Verse 30हे मुने, जैसा तुमने पूछा, वैसा ही मैंने उत्तर भी दिया । तुम्हारा कल्याण हो । अब हम लोग अप…
  30. Verse 31महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, ये नीलकण्ठ भगवान्‌ शंकर ऐसा कहकर, जिनके ऊपर मैंने उस…
  31. Verse 32हे श्रीरामचन्द्रजी, पहले से ही समाधि साधनों से सम्पन्न मैंने त्रिभुवन के अधिपति उमापति के…