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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । परस्मात्परमे व्योम्नि पूर्वोक्तक्रमतो वपुः । जीवः पश्यति संपन्नं स च स्वप्ननरो यथा ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवान शंकर ने कहा : हे मुने, जिस प्रकार स्वप्नमनुष्य अतिसूक्ष्म नाड़ियों में अत्यंत विस्तृत ब्रह्माण्ड देखता है, उसी प्रकार वह जीव भी परम सूक्ष्म चिदाकाश में पूर्वोक्त क्रम के अनुसार बना हुआ शरीर देखता है