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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । ततः स जीवो भगवन्दृष्टवान्देहसंभ्रमम् । आदिसर्गे नभःसंस्थः कामवस्थामुपैति हि ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

“जीवदेतदवस्थाकं स्थितं पश्यति देहकम्‌” इस वचन से पूर्व अध्याय के अन्त में जो अध्यारोप कहा गया है, उसके शेषांश की जिज्ञासा कर रहे महाराज वस्निष्ठजी पूछते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे भगवन्‌, तदनन्तर सृष्टि के आदि में यानी कल्प के प्रथम अध्यासक्रम में देहविभ्रम को देख रहा वह जीव आकाश में स्थित होकर किस अवस्था को प्राप्त करता है ?

सर्ग सन्दर्भ

इकतालीसवाँ सर्ग समाप्त बयालीसवाँ सर्ग ईश आदि से लेकर समष्टि -व्यष्ट्यात्मक जो संसार है, वह सब माया ही है, यह उपदेश देकर भगवान्‌ श्रीशंकर का अपने वासस्थान के प्रति गमन - यह वर्णन ।