Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
भेदोपशान्तावभ्यासाद्भवत्युपगतः शिवः ।
निमेषशतभागार्धमात्रमेव परा चितिः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
एक क्षण के सहस्रांश कालमात्र में भी यदि कहीं चिदात्मा बहिर्मुख हो जाय, तो करोड़ों कल्पो में
फैले हुए असंख्य अनर्थ प्राप्त हो जाते हैं, यह कहते है ।
निमेषमात्र के किये गये सौ भागों में से किसी एक के आधे भागमात्र कालपर्यन्त ही यदि परा चिति
अपने वास्तव स्वरूप से गिर जाय, तो वही महान् अनर्थरूप से उदित हो जाती है