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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

न चैते तत्स्वरूपा वा न कल्प्यं नापि च क्षणः । न चेदं जायते किंचिन्न च किंचन नश्यति ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

तब सभी सर्ग प्रलयपर्यन्त स्वयं ही सत्स्वरूप होंगे ? इस पर कहते हैं। ये सर्ग सत्स्वरूप नहीं हो सकते, क्योंकि ऐसा मानने पर सर्ग ओर सत्‌' दोनों पद एक दूसरे के पर्याय हो जाने से सर्ग की अविनाशापत्ति हो जायेगी नाभावो विद्यते सतः“ इससे भगवान्‌ ने सत्‌ पदार्थो का अविनाश ही सिद्ध किया है । (तब सर्ग में अध्यस्त ही सत्व मान लिया जाय ? इस पर कहते हैं।) सर्ग मे अध्यस्त भी सत्व नहीं माना जा सकता, क्योकि स्वयं असद्‌-रूप सर्ग में सत्वाध्यास की अधिष्ठानरूपता ही सिद्ध नहीं हो सकती । (तब वैनाशिक-मत के सदश धारारूप से अनुगत तत्‌-तत्‌ क्षणरूप ही सत्त्व सर्ग मेँ मानिये, इसमें क्या आपत्ति है ? इस पर कहते है) सर्ग मेँ क्षणरूप सत्त्व भी नहीं माना जा सकता, क्योकि क्षणरूप स्तव प्रतीतिकालपर्यन्त ठहर नहीं सकता । यदि अत्यन्त अप्रतीत में सत्ता मान ली जाय तो गगनकुसुम आदि अलीक (असत्‌) पदार्थो में भी सत्त्व की आपत्ति हो जायेगी । (इससे आद्यक्षण ओर अन्तक्षण के सम्बन्धरूप जन्म और विनाश भी सर्ग में निरस्त हो गये, इस आशय से कहते है ।) न तो यह सर्ग कुछ उत्पन्न ही होता है और न कुछ विनष्ट ही होता है