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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

स्वरूपतश्चेल्लुठिता सैषोदेत्यनवस्थितिः । सा ज्ञरूपा शिलाकाश इव चित्स्वात्मनिस्थिता ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

चिति की स्वरूप प्रतिष्ठा ही ब्रह्मरूपता है, इसे कहते है । तत्त्ववेत्ता पुरुषों के द्वारा अनुभूत होनेवाली, शिलाकाश की नाई अपने स्वरूप में अवस्थित चिति ही सूर्य आदि प्रकाशो से प्रकाशित न होनेवाले जन्मशून्य ब्रह्मचैतन्यस्वरूप है, अतः वह ब्रह्मशब्द से कही जाती हे