Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
एष एव क्रमस्तेषां सति वाऽसति सर्गके ।
अस्याः संसारमायाया एवंभूतार्थभावनात् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
तब कैसे इस सृष्टि का उपरम होता है ? इस पर कहते है।
परमार्थतत्त्व का चिन्तन करने से अनिर्वचनीय इस संसारमाया का विभेद विनष्ट हो जाता है,
तदनन्तर अभ्यास से शिवरूप पूज्यतत्त्व प्राप्त हो जाता है