Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
तस्मिन्गते त्रिभुवनाधिपतावुमेशे स्थित्वा क्षणं तदनु संस्मृतिपूर्वमेव ।
अङ्गीकृतं नवपवित्रधिया मयात्मदेवार्चनं शमवतैव जिहासितं तत् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, पहले से ही समाधि साधनों से
सम्पन्न मैंने त्रिभुवन के अधिपति उमापति के जाने के बाद क्षणभर चुप रहकर उनके स्मरणपूर्वक
उनके द्वारा उपदिष्ट नित्य अपरोक्ष आत्मरूप देवता का पूजन नवीन (परिष्कृत) और श्रद्धा आदि
से पवित्र हुई बुद्धि से अंगीकृत किया ओर पहले का वह जड़ देवार्चन छोड़ दिया