Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 104
एक सौ तीनवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चारवो सर्ग कुम्भ के रमण से राजा की संभोगेच्छा, स्वर्ग के बहाने नगर में जाना और खिन्न होकर वहाँ से फिर लौट आना।
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- Verses 1–9महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यों अध्यात्मविषयक विचित्र कथाओं को परस्पर कह रहे व…
- Verse 10विना घर की स्थिति का लक्षण बतलाते हैं। हे श्रीरामजी, यह घर हे, यह घर नहीं है, इस तरह की व…
- Verses 11–16वे दोनों मित्र कहीं तो धूलि से घूसरगात्र, कहीं चन्दन से चर्चित अगर कहीं पर तो भस्म से विभ…
- Verses 17–20अधर्म, रोग ओर श्रम आदि के कारणभूत भोगो से लोकसंग्रह के लिए दूर हट जाना चाहिए, यह ठीक है,…
- Verses 21–30तात्पर्य यह कि यथाप्राप्त भोगो का त्याग करके ज्ञानी कुछ भी अधिक फल उत्पन्न नहीं कर सकता।…
- Verses 31–39शिखिध्वज की दृष्टि के बाहर जाकर आकाश में चूडाला ने अपने कुम्भशरीर का परित्याग कर दिया और…
- Verse 40वेद्य वस्तु का ज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष हर्ष ओर विषाद जनित स्थिति का आश्रय नहीं करते”…
- Verse 41अतत्त्वज्ञो में ऐसी बात नहीं है, यह कहते हैं। है राजन्, जो अततत्त्वज्ञानी मूढ हैं वे बाल…
- Verse 42जब तक देह रहेगी तब तक प्रारब्धप्रयुक्त कर्मेन्द्रियों में हर्ष-गलानि आदि दशा ज्ञानी ओर अज…
- Verse 43ऐसी स्थिति में चित्त की समता से देहगत दुःखो का समाधि के कारण अदर्शन होना ही उनका परित्याग…
- Verse 44हे राजन्, तत्त्वज्ञानी को तव तक सभी दशाओं मेँ यथाप्राप्त सदाचार का कर्मेन्द्रियों के द्व…
- Verse 45कर्मेन्द्रियों के द्वारा देहदशाओं में अनिषिद्ध का अनुवर्तन ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण जीवन्मुक्…
- Verse 46प्रारब्धकर्मरूपी नियति का उल्लंघन अज्ञ या तत्त्वज्ञ किसीसे नहीं किया जा सकता, इसे कहते है…
- Verses 47–48तब क्या तत्त्वज्ञानी ओर मूर्ख दोनों बराबर ही है, नहीं, ऐसा उत्तर देते हैं। तत्त्वज्ञानी ल…
- Verse 49परन्तु अज्ञानी वैसा नहीं करते, यह कहते हैं। परन्तु अज्ञानी सब तरह के क्षोभ से सुख-दुःख की…