Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
ये ह्यतत्त्वविदो मूढा राजन्बालतयैव ते ।
अवस्थाभ्यः पलायन्ते गृहीताभ्यः स्वभावतः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
अतत्त्वज्ञो में ऐसी बात नहीं है, यह कहते हैं।
है राजन्, जो अततत्त्वज्ञानी मूढ हैं वे बालचित्त होने से ही यानी उनमें समचित्तरूपता का
अभाव होने से ही हठात् गृहीत तत्-तत् कर्मेन्द्रियों की निग्रहावस्थाओं से स्वभावतः (अज्ञानस्वभाव
से ही) च्युत हो जाते हैं