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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verses 21–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verses 21–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 21-30

संस्कृत श्लोक

तत्किंचिद्रचयाम्याशु प्रपञ्चं प्रेक्षया वने । येनायं भूपतिर्भर्ता रमते मयि मानदः ॥ २१ ॥ इति संचिन्त्य चूडाला कुम्भवेषधरा पतिम् । प्राह काननगुल्मस्था कोकिलं कोकिला यथा ॥ २२ ॥ कुम्भ उवाच । चैत्रमासस्य शुक्लोऽयं प्रतिपद्दिवसो महान् । अद्यास्थानं महारम्भं स्वर्गे भवति वै हरेः ॥ २३ ॥ संनिधानं मया तत्र कर्तव्यं पितुरग्रतः । यथास्थिता हि नियतिर्न संत्याज्या कदाचन ॥ २४ ॥ प्रतिपालयितव्यं मे त्वयेह च वनावनौ । क्रीडता नवपुष्पायां समुद्वेगमगच्छता ॥ २५ ॥ आगच्छामि दिनान्तेऽद्य निर्विकल्पं नभस्तलात् । सर्गादतितरामेव त्वत्सङ्गो मम तुष्टये ॥ २६ ॥ इत्युक्त्वा मञ्जरीं कुम्भो ददौ मित्राय कौसुमीम् । प्रीतये स्वामिव प्रीतिं कान्तां नन्दनवृक्षजाम् ॥ २७ ॥ आगन्तव्यं त्वया शीघ्रमेवं वदति भूपतौ । षुप्लुवेऽथ वनाद्वयोम शरन्मुखपयोदवत् ॥ २८ ॥ पुष्पाञ्जलिं जहौ व्योम व्रजन्कुसुमदामजम् । विसारि वनवातेन हिमं हैम इवाम्बुदः ॥ २९ ॥ शिखिध्वजो व्रजन्तं तं ददर्शाऽऽदर्शनं तदा । उन्निद्रोऽब्दं यथा बर्ही धीमत्प्रीतिर्हि दुस्त्यजा ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

तात्पर्य यह कि यथाप्राप्त भोगो का त्याग करके ज्ञानी कुछ भी अधिक फल उत्पन्न नहीं कर सकता। इसलिए मैं अपनी बुद्धि से इस कानन में शीघ्र कुछ प्रपंच की रचना करूँ, जिससे कि यह मानप्रदान करनेवाला मेरा पति राजा मुझमें रति सुख का लाभ करे । यों विचारकर काननकुंज में बैठी हुई कुम्भवेषधारिणी चूडाला ने अपने पति से उस तरह कहा, जिस तरह कोकिला अपने पति कोकिल से कहती हो । कुम्भ ने कहा : हे राजन्‌, यह चैत्रमास का शुक्ल पक्ष है ओर महान्‌ प्रतिपदा दिवस है। आज स्वर्ग में इन्द्र की समारोहपूर्वक बड़ी सभा होगी, जिसमें सब देवर्षियों का समागम होगा | मुझे अपने पिताजी के सामने वहाँ पहुँच कर उनका साक्षात्कार करना ही चाहिए, क्योकि यथास्थित नियति का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए हे राजन्‌, नवीन पुष्पों से शोभित इस वन-भूमि में किसी तरह के उद्वेग को न प्राप्त कर विहार करते हुए आप सायंकाल तक मेरी अवश्य प्रतीक्षा कीजियेगा । हे राजन्‌, आज सायंकाल को स्वर्ग से मैं निश्चित आ जाऊँगा, क्योकि मेरे आत्मसन्तोष के लिए आपका साथ मुझे स्वर्ग से भी बढ़कर प्रिय है। यों कहकर अपनी प्रीति-जैसी कल्पतरू के कुसुम की मनोहर मंजरी कुम्भ ने अपने मित्र राजा शिखिध्वज को उसकी प्रसन्नता के लिए दे दी। हे प्रिय मित्र, यहाँ शीघ्र आना, यों राजा शिखिध्वज के कहते ही वह कुम्भ वन से आकाश में, शरत्कालीन निर्जल मेघ की नाईं, उड़ गये। आकाश में जा रहे उस कुम्भ ने पुष्पमाला की पुष्पांजली, जो वनवायु से चारों ओर प्रसरण शील हो रही थी, ऐसे छोड़ दी, जैसे हिमकाल का मेघ हिम । जैसे मयूर तब तक मेघ को लगातार देखते ही रहता है जब तक कि वह मेघ उसकी आँखों से ओझल नहीं हो जाता, वैसे ही उस समय आकाश में जा रहे अपने मित्र को राजा शिखिध्वज तब तक उन्निद्र होकर देखते रहे जब तक कि कुम्भ आँखों से ओझल नहीं हो गये, क्योंकि बुद्धिमानों की प्रीति दुस्त्याज्य होती है - छोड़ते नहीं बनती