Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
यावद्देहं यथाचारं दशास्वङ्ग विजानता ।
कर्मेन्द्रियैर्हि स्थातव्यं न तु बुद्धीन्द्रियैः क्वचित् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्,
तत्त्वज्ञानी को तव तक सभी दशाओं मेँ यथाप्राप्त सदाचार का कर्मेन्द्रियों के द्वारा परिपालन करते हुए
ही अवस्थित रहना चाहिए, जब तक कि इस देह की स्थिति वनी हुई हे । ज्ञानेन्द्रियो तथा मन आदि से
तो सदा समचित्त होकर ही अवस्थित रहना चाहिए, कभी भी वैषम्यभाव को प्राप्त होकर नहीं