Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verses 47–48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verses 47–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
तज्ज्ञा बुद्ध्यादिसाम्येन पाण्यादिचलनेन च ।
नियतिं यापयन्तीमां यावद्देहमखण्डिताम् ॥ ४७ ॥
अज्ञास्तु सर्वक्षोभेण सुखदुःखदशाहताः ।
नियतिं यापयन्त्यङ्ग देहलक्षैर्विखण्डिताम् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या तत्त्वज्ञानी ओर मूर्ख दोनों बराबर ही है, नहीं, ऐसा उत्तर देते हैं।
तत्त्वज्ञानी लोग बुद्धि आदि के साम्य तथा हाथ, पैर आदि के संचालन से जब तक प्राप्त एक
अन्तिम देह का पतन नहीं हो जाता तब तक इस नियति को पूर्णतः बिताते चलते हैं