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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verses 31–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verses 31–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 31-39

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वजदृशामन्ते व्योम्नि कुम्भवपुर्जहौ । शान्तावर्तेव वारिश्रीर्मुग्धा स्वं रूपमाययौ ॥ ३१ ॥ प्राप मञ्जरिताकारकल्पवृक्षोपमं पुरम् । स्फुरत्पताकमात्मीयं स्वर्गरम्यं दिवः पथा ॥ ३२ ॥ अन्तःपुरमदृश्यैव विवेश ललनाकुलम् । मधुमासमहालक्ष्मीर्लसल्लतमिव द्रुमम् ॥ ३३ ॥ राजकार्याणि सर्वाणि तत्र संपाद्य सत्वरम् । शिखिध्वजस्य पुरतः पपात फलपुष्पवत् ॥ ३४ ॥ तत्र कालद्युति मुखं चकाराखिन्नमानसा । इन्दुं सनीहारमिव श्यामा खिन्नमिवाम्बुजम् ॥ ३५ ॥ तं दृष्ट्वा तादृशाकारं समुत्तस्थौ शिखिध्वजः । बभूव खिन्नचेताश्च समुवाचेदमादृतः ॥ ३६ ॥ देवपुत्र नमस्तेऽस्तु विमना इव लक्ष्यसे । कुम्भस्त्वं त्यज संरम्भमिदमासनमास्यताम् ॥ ३७ ॥ सन्तो विदितवेद्या ये ते हि हर्षविषादजाम् । नाश्रयन्ति स्थितिं स्वस्थाः पद्मा इव जलार्द्रताम् ॥ ३८ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । तेन क्ष्मापतिनेत्युक्ते कुम्भ आहासने विशन् । गिरा विषण्णया शीर्णवंशस्वनसमानया ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

शिखिध्वज की दृष्टि के बाहर जाकर आकाश में चूडाला ने अपने कुम्भशरीर का परित्याग कर दिया और वह मुग्धा अपने पूर्वरूप में उस तरह आ गई जिस तरह आवर्त के शान्त हो जाने पर जलश्री । आकाश-पथ से वह चूडाला स्वर्ग के समान रमणीय अपने नगर में पहुँच गई, जहाँ पताका फहरा रही थी अतएव जो मंजरीयुक्त आकारवाले कल्पवृक्ष के सदृश मालूम हो रहा था स्त्रियों से भरे हुए अपने अन्तःपुर में अदृश्यरूप से वह चूडाला उस तरह प्रविष्ट हो गई, जिस तरह लताओं से शोभित वृक्ष में वसन्त की महालक्ष्मी । वहाँ झटपट सब राज्यकार्यो का सम्पादन कर वह चूडाला, जैसे वृक्ष से फल या पुष्प गिरता है, वैसे ही राजा शिखिध्वज के आगे आकर गिरी । हिमयुक्त चन्द्र जैसे कमल को खिन्न बना देता है वैसे ही अत्यन्त खिन्न मनवाली श्यामा उस चूडाला ने अपने स्वामी की सन्निधि में अपने मुख को श्यामद्युति से युक्त खिन्न बना दिया । उस तरह के आकार से युक्त उसे देखकर राजा शिखिध्वज उठकर खडा हो गया ओर खिन्न चित्त हो गया । खिन्न चित्त उस राजा ने बड़े आदर के साथ यह कहा : देवपुत्र, आपको नमस्कार है । आपके मुख में ग्लानि झलक रही है, अतः आप खिन्न चित्त दीख रहे हैँ । आप तो कुम्भ है । इस मानसिक ताप को दूर कर दीजिए ओर इस आसन पर बैठ जाइये । मित्र, कमल जैसे जल की आर्द्रता का आश्रय नहीं करते, वैसे ही जो अपने स्वरूप में स्थित सन्त महानुभाव वेद्य वस्तु का ज्ञान किये हुए रहते हैं वे हर्ष ओर विषाद जनित स्थिति का आश्रय नहीं करते । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यों राजा शिखिध्वज के कहने पर आसन पर वैठते-वैठते कुम्भ ने फटे बाँस की ध्वनि के समान विषादभरी वाणी से कहा