Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
एष देहदशादुःखपरित्यागो ह्यनुत्तमः ।
यत्साम्यं चेतसो योगान्न तु कर्मेन्द्रियस्थितेः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में चित्त की समता से देहगत दुःखो का समाधि के कारण अदर्शन होना ही उनका
परित्याग है, जवर्दस्ती कर्मेन्द्रियों के निग्रह से उन्हे सहन करना उनका परित्याग नहीं, यह निष्कर्ष है,
इसे कहते है ।
समाधि से चित्त की जो समता है यही देह में प्राप्त दुःखों का सर्वोत्तम परित्याग है । कर्मेन्द्रियों की
संस्थिति से यानी कर्मेन्द्रियं के निग्रह से उन्हें सहन करना उनका परित्याग नहीं है