Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verses 11–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verses 11–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 11-16
संस्कृत श्लोक
विचेरतुस्तौ सुहृदौ क्वचिद्धूलिविधूसरौ ।
क्वचिच्चन्दनदिग्धाङ्गौ क्वचिद्भस्मानुरञ्जितौ ॥ ११ ॥
क्वचिद्दिव्याम्बरधरौ चित्राम्बरधरौ क्वचित् ।
क्वचित्पल्लवसंछन्नौ क्वचित्कुसुममण्डितौ ॥ १२ ॥
दिनैः कतिपयैरेव समचित्ततया तया ।
सत्त्वोदात्ततया चैव राजा कुम्भवदाबभौ ॥ १३ ॥
अथ तं सुरगर्भाभं चूडाला सा शिखिध्वजम् ।
दृष्ट्वा शोभामुपगतं चिन्तयामास मानिनी ॥ १४ ॥
अयं पतिरदीनात्मा रम्याश्च वनभूमयः ।
इयं स्थितिरनायासा या न कामेन वञ्चिता ॥ १५ ॥
जीवन्मुक्तधियां भोगं यथाप्राप्तमतिष्ठताम् ।
एकाग्रहात्मिका तुच्छा मूढतैवोदिता भवेत् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
वे दोनों मित्र कहीं तो धूलि से घूसरगात्र, कहीं चन्दन से चर्चित अगर कहीं पर तो भस्म से
विभूषितगात्र होकर विचरण करते-फिरते थे । वे दोनों कहीं दिव्य वस्त्र धारण किये हुए; चित्रविचित्र
वस्त्र से शोभित हुए, कहीं पल्लवां से आच्छन्न ओर कहीं कुसुमों से मण्डित हुए विचरते थे । हे
श्रीरामजी, कुछ इने-गिने ही दिनों में समानचित्त हो जाने से तथा उस निर्वसिन मन के कारण
उत्कृष्ट हो जाने से राजा शिखिध्वज कुम्भ के समान शोभित होने लगा । अनन्तर, देवसन्तान के
समान कान्ति से युक्त तथा अपूर्वं शोभा को प्राप्त उस राजा शिखिध्वज को देखकर मानिनी चूडाला
विचार करने लगी । एक ओर तो सामने यह उदारात्मा मेरे स्वामी हैं और दूसरी ओर ये मनोहर कानन
की भूमिर्यो हैं, फिर यह अनायास प्राप्त जो हम लोगों की स्थिति है, वह काम से (रतिसुख से)
वंचित नहीं रह सकती । प्रारब्ध-प्राप्त भोगों के प्रति अनिवृत्त गतिवाले यानी बे-रोक-टोक प्रारब्ध
से प्राप्त हुए सुख-दुःखों का अनुभव करनेवाले जीवन्मुक्त महात्मा यदि केवल एक भोगनिवृत्ति
करने में ही आग्रह कर लें, तो वह उनकी तुच्छ मूढता ही होगी