Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
इत्थं सुखेषु ननु दुःखदशासु चेत्थं स्थातव्यमित्यधिगतं यदिहाङ्ग जीवैः ।
अज्ञज्ञभूतनिवहस्फुरितस्तदेवं दुर्लंघ्य एष नियतो नियतेर्विलासः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
परन्तु अज्ञानी वैसा नहीं करते, यह कहते हैं।
परन्तु अज्ञानी सब तरह के क्षोभ से सुख-दुःख की दशाओं में आहत होकर लाखों शरीरों के द्वारा
नियति को अपूर्णरूप से बिताते चलते हैं ॥४ ८॥
प्रारब्धकर्मरूपी नियति के स्वरूप को दिखला रहे कुम्भ ऋषि उसकी सबसे दुर्लाध्यता का अनुवाद
कर उपसंहार करते हैं।
हे राजन्, इस प्राणी को इस जन्म में इस रीति से सुखो में और इस रीति से दुःख की दशाओं
में अवस्थित रहना चाहिए । अपने-अपने कर्मो के अनुसार जीवों को जैसा ललादाक्षर प्राप्त है तत्-
तत् विषय में अज्ञ या ज्ञानी सब भूतों में वैसा ही यह नियति (प्रारब्धकर्म) का नियत विकास हे, जो
पूर्वोक्त रीति से दुर्लघ्य हे