Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
यावद्देहमवस्थासु समचित्ततयैव ये ।
कर्मेन्द्रियैर्न तिष्ठन्ति न ते तत्त्वविदः शठाः ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
वेद्य वस्तु का ज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष हर्ष ओर विषाद जनित स्थिति का आश्रय नहीं करते” यह
जो राजा ने कहा है उसमें कुछ विशेष कहने की इच्छा कर रहे कुम्भ कहते हैं।
जब तक देह की स्थिति रहती है तब तक आनेवाली हर्ष-शोक आदि अवस्थाओं में ज्ञानजनित
समचित्तता के कारण कर्मेन्द्रियो की चेष्टाओं मेँ जो अवस्थित नहीं रहते वे तत्त्वज्ञानी प्रारब्धप्राप्त
कर्मेन्द्रियों की चेष्टाओं का उद्भव हो जानेमात्र से शठ नहीं हो जाते